अमेरिका के रक्षा विभाग ने हाल में एक नया फैसला लिया है. इसके तहत वो जर्मनी से अपने करीब 12000 सैनिकों को वापस बुला रहा है. प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के कहने पर ये फैसला लिया गया. माना जा रहा है कि सैनिकों की घर वापसी के पीछे एक बड़ा आर्थिक गणित काम कर रहा है. खुद ट्रंप का मानना है कि उनके जो सैनिक जर्मनी में तैनात हैं, जर्मनी उनके लिए उतना खर्च नहीं देती है, जितना होना चाहिए. वैसे विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिकन आर्मी को बुलाने के पीछे कई वजहें हैं.

क्या है पूरा मामला
अमेरिका ने 29 जुलाई को जर्मनी से अपने सैनिकों को वापस बुलाने और उनमें से कुछ सैनिकों को दूसरे देशों में तैनात करने का एलान किया. ये सारा काम चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा. वापस बुलाए गए सैनिकों में से लगभग 6400 अमेरिका में ही रहेंगे और बाकी सैनिक यूरोप में नाटो के दूसरे सदस्य देशों जैसे इटली और बेल्जियम में तैनात होंगे. इस आधिकारिक एलान से पहले भी ट्रंप ने जर्मनी से अपनी सेना कम करने का इशारा दिया था. इसके बाद से जर्मनी और अमेरिका के बीच तनाव भी चल रहा है.

अमेरिका जर्मनी से अपने करीब 12000 सैनिकों को वापस बुला रहा है

क्या है आर्थिक मसला
अमेरिका ने अपने सैनिक वापस बुलाने के पीछे आर्थिक कारण बताए. बुधवार को ट्रंप ने वाइट हाउस में कहा कि जर्मनी को नाटो के तहत अपनी जीडीपी का 2% सैनिकों पर लगाना था लेकिन वो ऐसा नहीं कर रहा है. ऐसे में अमेरिका ही सैनिकों के खर्चों की भरपाई कर रहा है. कुल मिलाकर जर्मनी अमेरिका का फायदा उठा रहा है इसलिए अब वहां से सैनिक कम किए जा रहे हैं. सैन्य खर्चों को लेकर पहले भी जर्मनी की चांसलर मर्केल और ट्रंप के बीच मतभेद हुआ है.

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अमेरिका कर रहा बड़ा खर्च
अमेरिका जहां सैनिकों के खर्च से जर्मनी के भागने की बात कहता है, वहीं जर्मनी का अलग पक्ष है. डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट के अनुसार जर्मनी ने पिछले एक दशक में अमेरिकी सेना पर लगभग 1 अरब यूरो खर्च किए. हाालंकि अमेरिका जर्मनी में अपने सैनिकों पर काफी ज्यादा खर्च करता है. उसका अंदाजा है कि सिर्फ 2020 में उस अकेले देश में अपने सैनिकों पर उसका खर्च 7 अरब यूरो बैठेगा. कथित तौर पर इससे ट्रंप झल्लाए हुए हैं.

ट्रंप के मुताबिक जर्मनी अमेरिका का आर्थिक फायदा उठा रहा है

रूस पर भी ट्रंप नाराज
वैसे बात सिर्फ इतनी ही नहीं है. इसका दूसरा पहलू भी है. माना जा रहा है कि ट्रंप रूस से खुद को खतरे में देख रहे हैं. इसकी एक वजह रूस का सबसे पहले कोरोना वैक्सीन तैयार करने का दावा है. बता दें कि रूस अगस्त के दूसरे हफ्ते तक वैक्सीन लाने का दावा कर रहा है. अगर ऐसा हो पाता है तो रूस दौड़ में काफी आगे निकल जाएगा. एक वैक्सीन बनाने से उसे आर्थिक के अलावा कई दूसरे तरह के फायदे भी होंगे. इसी से अमेरिका नाराज है.

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सीएनएन की एक रिपोर्ट में जर्मनी से आर्थिक मामले के कारण सेना हटाने की बात पर विशेषज्ञ कहते हैं कि नई होस्ट कंट्री जहां सैनिकों को तैनात किया जाएगा, वे भी अपनी जीडीपी का 2 प्रतिशत सेना को नहीं देने जा रहे. रूस पर ट्रंप के गुस्से का अंदाजा उनके इस ट्वीट से भी मिलता है, जिसमें उन्होंने कहा कि जर्मनी रूस को एनर्जी के लिए हर साल खरबों डॉलर देता है और यहां हमसे उम्मीद की जाती है कि हम उसे रूस से बचाएं!

बता दें कि साल 2014 में नाटो के सदस्य देशों ने एक समझौते पर हामी भरी थी, जिसके तहत सभी देशों को अपनी जीडीपी में से कम से कम 2% रक्षा बजट के तौर पर रखना था.

ट्रंप के सैनिकों को वापस बुलाने का असर जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर भी हो सकता है (Photo-pixabay)

फिलहाल जर्मनी 2% की बजाए सैन्य बजट पर 1.38 प्रतिशत लगा रहा है. इसी वजह से ट्रंप ने ये दंडात्मक कदम लिया है. वैसे सवाल ये भी आता है कि आखिर जर्मनी में अमेरिकी सैनिक क्या कर रहे हैं. तो वहां पर अमेरिकी आर्मी दूसरे विश्व युद्ध के बाद से तैनात है. ये नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन के तहत वहां पर हैं. अप्रैल 1949 में इसका गठन सोवियत संघ यानी रूस का मुकाबला करने के लिए बना था. अब भी ये सैन्य साझेदारी चली आ रही है. इसके तहत जर्मनी ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, स्पेन और जापान में भी बड़ी संख्या में अमेरिकी बल तैनात है.

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सैनिकों की घर वापसी का असर जर्मनी पर
दूसरी तरफ ट्रंप के सैनिकों को वापस बुलाने का असर जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर भी हो सकता है. अमेरिकी सैनिक अकेले नहीं जाते, बल्कि उनके साथ परिवार भी होते हैं. ऐसे में आर्मी जहां है, उसके आसपास बाजार, स्कूल, अस्पताल जैसी सारी सुविधाएं हो जाती हैं. साथ में भारी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है. यही वजह है आर्मी ठिकानों के पास रहने वाले स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति काफी बेहतर होती है. अब जब सीधे कई हजार सैनिक हटेंगे तो साथ में परिवार भी जाएंगे और इससे आसपास बसी आबादी पर काफी असर हो सकता है.

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